मुजफ्फरनगर। हिंदू धर्म संस्कृति के बीच देशभर के साथ जिलेभर में वट सावित्री व्रत सोमवार को आस्था-विश्वास के बीच मनाया गया। हालांकि पंचांग गणना के बीच कुछ क्षेत्रों में महिलाओं द्वारा मंगलवार को भी वट सावित्री व्रत रखे जाने की संभावना जताई जा रही है। अखंड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए मनाए जाने वाले इस धार्मिक पर्व की मान्यता है कि इस दिन किए गए दान-पुण्य का कई गुना फल मिलता है। वट सावित्री व्रत हर वर्ष ज्येष्ठ माह अमावस्या तिथि को रखे जाने का विधान है। इस बार वैसे तो अमावस्या मंगलवार को भी रहेगी, लेकिन अमावस्या उदय तिथि 26 मई, सोमवार को रही, जबकि मंगलवार सुबह दान-पुण्य का विशेष महत्व रहेगा। वैसे इस दिन सुहागिन महिलाएं वट वृक्ष की ही पूजा करती हैं। पौराणिक मान्यता है कि इस दिन विधिवत पूजा-अर्चना करने मात्र से जहां अखंड सौभाग्य का फल मिलता है, वहीं पति को लंबी आयु प्राप्त होती है।
सोमवार को इन्हीं परम्पराओं के बीच आस्था एवं विश्वास का प्रतीक वट सावित्री व्रत देशभर में धूमधाम के साथ मनाया गया। इस दौरान घरों में अलसुबह से ही सुहानि स्त्रियां साफ-सफाई के साथ अपने बुजुर्गों को प्रसन्न करने के निमित्त भोजन और उपहार देने के लिए खुशनुमा माहौल में तैयारियों में जुटी रही। वट सावित्री व्रत रखने वाली महिलाएं वट वृक्ष की पूजा करने से पूर्व सावित्री-सत्यवान की कथा, लाल कलावा, कच्चा सूत, धूप-दीप, अगरबत्ती, घी, रोली, मिठाई, मिट्टी का दीपक, सवा मीटर कपड़ा, नारियल, पान, अक्षत, सिंदूर व अन्य तमाम श्रृंगार का सामान भेंट स्वरूप थाली में रखते हुए पूजा करती हैं। विधि-विधान से पूजा करने के बाद में वट वृक्ष पर जल चढ़ाती हैं। वहीं कच्चे सूत से वट के वृक्ष में सात बार परिक्रमा करने का विधान है। हालांकि अधिकांश महिलाएं घरों में वट वृक्ष के पत्तों को घड़ा, करवा या कलश स्वरूप लोटे में रखते हुए इस बीच महिलाएं पूजन कर घर परिवार की सुख-समृद्धि के साथ पति की लंबी आयु की मंगल कामनाओं के साथ बुजुर्गों को भोजन के साथ उपहार स्वरूप वस्त्र व धनराशि भेंट करती हैं। वहीं देर सायं महिलाएं चन्द्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोलती हंै। मान्यता है कि यम का भय वट वृक्ष दूर करता है। वहीं महिलाएं व्रत में आम, चना, पूरी, खरबूजा, पुआ आदि चीजों से वट वृक्ष या उसके पत्तों की पूजा करती है। वट सावित्री व्रत देवी सावित्री को समर्पित है, जिन्होंने अपने पति सत्यवान को मृत्यु के देव यमराज से बचाया था।
पौराणिक मान्यता के तहत, सावित्री ने बरगद के पेड़ के नीचे मृत पति के जीवन को वापस लाई थी। यमराज को अपने पुण्य धर्म से प्रसन्न कर, आशीर्वाद प्राप्त किया था। यही कारण है कि वट सावित्री व्रत पर महिलाएं वट वृक्ष की पूजा करती हैं। इसके अलावा संतान प्राप्ति के लिए यह व्रत लाभकारी है। पंचांग गणना के आधार पर भरतिया कॉलोनी नई मंडी स्थित मनकामेश्वर शिव मंदिर के पुरोहित पं. अरूण मिश्रा ने बताया कि वट सावित्री पूजन ज्येष्ठ माह अमावस्या को मनाई जाती है, जो सोमवार 26 मई को अमावस्या पूर्व विद्धा यानि चतुर्दशी-अमावस्या का संयोग सूर्योदय से तीन मुहूर्त आगे या सूर्यास्त से तीन मुहूर्त बाद होना चाहिए। इसके साथ चतुर्दशी के 18 घटी से अधिक व अमावस्या को दूषित करने का नियम इस अमावस्या पर लागू नहीं होता।







