शुकताल/मुजफ्फरनगर (रिपोर्टर)। जनपद की पौराणिक और भागवत उद्गम स्थली तीर्थ नगरी शुकतीर्थ (शुकताल) से एक बेहद दुखद और स्तब्ध कर देने वाली खबर सामने आई है। शुकतीर्थ स्थित सुप्रसिद्ध ‘श्री हनुमान धाम’ के पीठाधीश्वर और श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी के महामंडलेश्वर स्वामी केशवानंद सरस्वती जी महाराज ब्रह्मलीन हो गए हैं। रविवार सुबह उनके महाप्राण (महाप्रयाण) होने की सूचना मिलते ही पूरी तीर्थ नगरी, संत समाज और देश-विदेश में फैले उनके लाखों श्रद्धालुओं में शोक की लहर दौड़ गई है। मंत्री कपिल देव अग्रवाल ने भी दुख की इस घड़ी में अपनी शोक संवेदना व्यक्त करते हुए इसे संत समाज के लिए अपूरणीय क्षति बताया।
मंत्री कपिल देव अग्रवाल ने अपनी शोक संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि महामंडलेश्वर स्वामी केशवानंद सरस्वती जी महाराज लंबे समय से शुकतीर्थ की धार्मिक चेतना और सामाजिक उत्थान के केंद्र रहे हनुमान धाम का संचालन देख रहे थे। उनके सानिध्य में हनुमान धाम परिसर में देश की कई अनूठी धार्मिक गतिविधियों और भव्य उत्सवों का आयोजन होता रहा है। वह न केवल धर्म और संस्कृति के रक्षक थे, बल्कि शुकतीर्थ को एक वैश्विक पर्यटन और धार्मिक पहचान दिलाने में भी उनका अतुलनीय योगदान रहा है। उनके ब्रह्मलीन होने को संत समाज ने सनातन जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति बताया। उन्होंने कहा कि महाराज श्री का समूचा जीवन धर्म, भक्ति, साधना और समाज सेवा को समर्पित रहा। वे न केवल आध्यात्मिक चेतना के अग्रदूत थे, बल्कि अनगिनत श्रद्धालुओं के लिए प्रेरणा स्रोत एवं मार्गदर्शक भी रहे। उनके सान्निध्य में असंख्य लोगों ने आध्यात्मिक शांति और जीवन की सही दिशा प्राप्त की। उनका यह दिव्य विछोह समाज और सनातन परंपरा के लिए अपूरणीय क्षति है।
फ्रेंड्स रिपोर्टर परिवार इस दुख की घड़ी में हनुमान धाम से जुड़े सभी संतों, सेवादारों और देश-विदेश के लाखों श्रद्धालुओं के प्रति अपनी गहरी संवेदना प्रकट करता है। ईश्वर से प्रार्थना है कि वे दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें तथा शोकाकुल श्रद्धालुओं और परिजनों को इस दुःख को सहने की शक्ति प्रदान करें।

हिंदू धर्म की मान्यताओं में नैतिक आचरण व ब्राह्मणों की सर्वोच्च धार्मिक और बौद्धिक स्थिति का उल्लेख है- अशोक बालियान
मुजफ्फरनगर (रिपोर्टर)। पीजेंट वेलफेयर एसोशिएसन के चेयरमैन अशोक बालियान का कहना है कि हिंदू धर्म की मान्यताओं में नैतिक आचरण व ब्राह्मणों की सर्वोच्च धार्मिक और बौद्धिक स्थिति का उल्लेख है। उन्होंने इस संबंध में जानकारी देते हुए बताएं कि सन् 1660 में प्रकाशित पुस्तक ‘De reyse en Optekeningh Van den Heer Boulaye’ में फ्रांसीसी






