मुजफ्फरनगर (रिपोर्टर)। आज जब दिल्ली की सड़कों पर एक बार फिर तथाकथित ‘प्रोटेस्ट’ के नाम पर हुड़दंग और अराजकता फैलाने की कोशिश की जा रही है, तब देश के हर राष्ट्रभक्त नागरिक और विशेषकर हमारे युवाओं व किसान को इस पूरे खेल के पीछे छिपे वैश्विक गठजोड़ (Global Nexus) के खतरनाक पैटर्न को समझना होगा। विगत कुछ समय से दुनिया ने देखा है कि कैसे कुछ शक्तिशाली देशों में सुनियोजित ‘फॉल्स नैरेटिव’ (भ्रामक प्रचार) के दम पर चुनी हुई सरकारों को उखाड़ फेंका गया और उन देशों को गृहयुद्ध की आग में झोंक दिया गया। ठीक यही घिनौना प्रयोग आज भारत की लोकतांत्रिक साख, हमारी वैज्ञानिक प्रगति और आर्थिक आत्मनिर्भरता को नष्ट करने के लिए किया जा रहा है। इस ‘इकोसिस्टम’ में देश के भीतर बैठे कुछ कथित बुद्धिजीवी, स्वार्थी तत्व और बाहरी ताकतों से पोषित (Foreign Funded) संस्थाएं शामिल हैं। इस अराजक इकोसिस्टम का सबसे खतरनाक चरित्र संवैधानिक संस्थाओं की साख पर निरंतर चोट करना है। इनका लोकतांत्रिक निष्ठा का पैमाना पूरी तरह से सुविधावादी (Selective Compliance) है। जब पश्चिम बंगाल, हिमाचल प्रदेश या कर्नाटक में जनमत इनके अनुकूल आता है, तब भारत का निर्वाचन आयोग (ECI) और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) पूरी तरह दोषमुक्त, निष्पक्ष और पवित्र हो जाते हैं परंतु, जैसे ही देश की जागरूक जनता राष्ट्रवाद और विकास के पक्ष में प्रचंड जनादेश देती है, वैसे ही रातों-रात लोकतंत्र को ‘खतरे’ में घोषित कर दिया जाता है और वैश्विक स्तर पर भारत की चुनावी साख को धूमिल करने का अंतरराष्ट्रीय अभियान शुरू कर दिया जाता है। यह दोहरा मापदंड किसी संस्था का विरोध नहीं, बल्कि भारत के करोड़ों मतदाताओं के विवेक और पवित्र जनादेश का खुला अपमान है।
भारतीय चुनाव आयोग (ECI) द्वारा किए जाने वाले मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (Special Intensive Revision – SIR) को लोकतांत्रिक प्रक्रिया की शुचिता, निष्पक्षता और सटीकता बनाए रखने के लिए एक अनिवार्य और सकारात्मक कदम माना जाता है। एक गतिशील जनसंख्या वाले देश में लाखों लोग हर साल शहर या राज्य बदलते हैं। ‘SIR’ प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य उन मतदाताओं की पहचान करना है जो या तो किसी अन्य स्थान पर स्थानांतरित हो चुके हैं या जिनकी मृत्यु हो चुकी है, ताकि मतदाता सूची पूरी तरह वास्तविक रहे। यदि पुरानी सूचियों को गहन रूप से संशोधित न किया जाए, तो फर्जी मतदान (Fake Voting) और एक ही व्यक्ति के कई स्थानों पर वोट होने की संभावना बढ़ जाती है, जिससे वास्तविक जनादेश प्रभावित हो सकता है। हर साल बड़ी संख्या में युवा 18 वर्ष की आयु पूरी कर मतदान के पात्र बनते हैं। यह विशेष पुनरीक्षण अभियान यह सुनिश्चित करता है कि ऐसे नए मतदाताओं का नाम बिना किसी कठिनाई के और प्राथमिकता के आधार पर मतदाता सूची में जोड़ा जा सके। चुनाव आयोग SIR’ के माध्यम से मतदाता सूची को आधार (Aadhaar) या अन्य डिजिटल पहचान पत्रों के डेटा से जोड़कर त्रुटिहीन बनाने का प्रयास करता है। यह तकनीक-आधारित संशोधन भविष्य में किसी भी प्रकार की मानवीय चूक या हेरफेर की गुंजाइश को न्यूनतम करता है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर एक ही समय में विशेष हैशटैग्स का ट्रेंड करना और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को आक्रामक रूप से उठाना एक सुव्यवस्थित डिजिटल रणनीति का हिस्सा माना जाता है। दिल्ली में प्रदर्शनकारियों को लाने, उनके ठहरने और व्यापक स्तर पर रसद की व्यवस्था करना यह दर्शाता है कि यह केवल एक स्वतःस्फूर्त जन-आंदोलन नहीं, बल्कि इसके पीछे एक सुसंगठित संगठनात्मक ढांचा काम कर रहा है। केंद्र सरकार के तीन कृषि कानून वास्तव में देश के छोटे और सीमांत किसानों को बिचौलियों के चंगुल से मुक्त करने और उन्हें आधुनिक बाजार देने के लिए थे। सरकार हर स्तर पर वार्ता और कानूनों में आवश्यक सुधार व संशोधन करने को पूरी तरह तैयार थी लेकिन इस टूलकिट गैंग ने सीधे-सादे किसान संगठनों को इस कदर गुमराह किया कि देश को दशकों पीछे धकेलते हुए उन कानूनों को वापस लेने पर मजबूर कर दिया गया। यह किसानों की जीत नहीं, बल्कि भारतीय कृषि को पिछड़ा बनाए रखने की वैश्विक लॉबी की जीत थी।
अभी हाल ही में छात्र आंदोलनों और प्रशासनिक चुनौतियों के भेष में इस अराजक इकोसिस्टम ने युवाओं के भविष्य को मोहरा बनाया। इनका उद्देश्य परीक्षाओं की शुचिता में सुधार करना नहीं था, बल्कि छात्रों की आड़ में राजनीतिक रोटियां सेकना और केंद्रीय शिक्षा मंत्री (धर्मेंद्र प्रधान) का इस्तीफा करवाना था, ताकि देश का पूरा शिक्षा तंत्र पंगु हो जाए और सरकार रक्षात्मक मुद्रा में आ जाए।
यह भ्रामक नैरेटिव केवल राजनीति तक सीमित नहीं है, यह सीधे भारत की खाद्य सुरक्षा पर प्रहार है। दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति और प्रख्यात वैज्ञानिक डॉ. दीपक पेंटल एवं उनकी टीम ने पूरी तरह स्वदेशी जीएम सरसों (DMH-11) विकसित की, जिससे देश खाद्य तेलों के आयात से मुक्त हो सके। जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी (GEAC) की हरी झंडी के बाद भी छद्म पर्यावरणविदों ने इसे कोर्ट में अटका दिया।

कपास उत्पादन बढाने के लिए कपास के बीज में अगली पीढ़ी की HTBT तकनीक को कानूनी रूप से भारत में आने से रोका गया, जिससे किसान मजबूरन अवैध और असुरक्षित बीज बोने को मजबूर हुए।और भारत कपास के विषय में निर्यातक से पुन: आयतक बन गया है। राफेल लड़ाकू विमान सौदा हो, सीएए (CAA) कानून हो, या जज लोया प्रकरण हो, इन सभी पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत को बदनाम करने के लिए जो प्रोपेगैंडा चलाया गया, इन सभी विषयों पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) और सीएए के मामले में स्थापित मानवीय तथ्यों ने पूरी तरह खारिज कर क्लीन चिट दी थी। हम देश के समस्त किसानों और युवाओं से अपील करते हैं कि इस वैचारिक टूलकिट के छद्म चेहरे को पहचानें। भारत विरोधी किसी भी नैरेटिव को तथ्यों और तर्कों की कसौटी पर कसें और देश की प्रगति की राह में रोड़ा अटकाने वाले इन राष्ट्र विरोधी बुद्धिजीवियों को सिरे से नकार दें। मतदाता सूचियों या अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं से जुड़ी चिंताओं का निपटारा चुनाव आयोग और न्यायपालिका जैसी स्थापित संस्थाओं द्वारा किया जाना उचित है।

शिक्षक एवं स्नातक विधान परिषद चुनाव को लेकर भाजपा ने बनाई रणनीति, कार्यकर्ताओं को सौंपी जिम्मेदारी
मुजफ्फरनगर (रिपोर्टर)। भारतीय जनता पार्टी के जिला कार्यालय पर शिक्षक एवं स्नातक विधान परिषद चुनाव की तैयारियों को लेकर संगठनात्मक बैठक आयोजित की गई। बैठक में आगामी चुनावों की रणनीति पर विस्तार से विचार-विमर्श करते हुए मतदाता संपर्क अभियान को प्रभावी बनाने, संगठनात्मक जिम्मेदारियां निर्धारित करने तथा चुनावी तैयारियों को गति देने पर जोर दिया






