यह कहाँ आ गए यूँ ही राह चलते चलते

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आजकल की शादी में लोगों को खाने के लिए ऐसे हाथ फैलाये देख भिखारियों वाली फिलिंग आती है,खास कर रोटी के लिए ,फास्ट फूड, आइसक्रीम, छत्ता (बर्फ का गोला) पानी पताशा ,मोक्टेल और गर्म आईटम पर तो पूछो .मत भीड
शादी में लाखों खर्च करके भी मेहमानों को मंगतो की तरह खाना मांगना पड़े तो धिक्कार है आयोजकों पर, पश्चिम से आई संस्कृति ने हमें ये बनाया है…। यह सब हमारी ही देन है शादी-ब्याह तौ पहले भी होते थे ईतनी अव्यवस्था नही होती थी समाज मे दिखावे के चक्कर मे या दुसरे शब्दो मे आधुनिक दिखने के चक्कर मे खाने के लिए केटरिंग वालो को मेनेजमेंट दे रहै है केटरिंग वाला पुरा व्यापारी है
आपकी नादानी का भरपूर फायदा उठायेगा सिर्फ और सिर्फ डेकोरेशन, वेटर,क्रॉकरी, प्लेट, ज्यादा से ज्यादा आईटम की शो बाजी (अचार,मुरब्बा,नमकीन तले हुए आईटम, धी की मिठाई) तो 2/3 दिन के कार्यक्रम मे शुरू मे लगती है और अन्त तक पडी रहती है फिर अगली शादी मे काम आयेगी सिर्फ गिनती दिखाने के लिए 40/50 तरह की मिठाई लगा देते है सिर्फ शो बाजी जैसे.मिठाई की दुकान पर खडे है वेटर के देने के भाव नही होते है न मनुहार न सम्मान 2/4 मिठाई ढग की होती है वह भी आम आदमी के पहुंच के बाहार बार बार वेटर से मागने पडती है क्योकि वह दुर रखी होती हे हाथ पहुंचता नही या ठहरो गर्म आ रही है केटरिंग वाले की समझदारी देखे सर्दी मे गर्म जलेबी की कढाई 1 रखते है वह तिन कढाई भी रख सकते है आदमी तो बहुत है बनाने वाले पर बनानी नही है लाखो रूपए लेते हे पकबान भले ही थोड़े कम बनबाइये इससे जो पैसा बचेगा उससे खाना परोशने बाले लड़कों की व्यवस्था कीजिये उनको भी रोजगार मिलेगा पर बैठकर सम्मान के साथ खाने खिलाने की व्यवस्था कीजिये सभी आयोजक जरूर सोचें और विचार करें आईटम सिमित करे और मनुहार से ससम्मान भोजन करवावे और समाज को अनावश्यक बढ रहे बोझ से मुक्त करवावे आप की पहल समाज को नई दिशा प्रदान करेगी

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