सजे मंदिर और दरबार चैत्र नवरात्रि और नव संवत्सर आज से प्रारंभ

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मुजफ्फरनगर। इस वर्ष चैत्र नवरात्रि 09 अप्रैल प्रतिपदा तिथि पर कलश स्थापना के साथ देवी दुर्गा की आराधना का महापर्व शुरू होता है। नवरात्रि के पहले दिन यानी चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा तिथि पर शुभ मुहूर्त वैदिक पंचांग की गणना के मुताबिक 9 अप्रैल को सुबह 7 बजकर 32 मिनट तक पंचक रहेगा। यानी पंचक के समाप्ति बाद घट स्थापना करना शुभ रहेगा। 09 अप्रैल को अच्छा मुहूर्त 11.57 बजे से 12.48 बजे तक अभिजीत मुहूर्त में कलश स्थापना के लिए सर्वश्रेष्ठ है। वहीं इस समय वैघृत योग और अश्विनी नक्षत्र का संयोग भी रहेगा। ऐसे में घटस्थापना, पूजा का संकल्प लेना व मंत्रों का जाप करना शुभ फलदायी रहेगा। विद्वानों के अनुसार इस बार माता रानी घोड़े पर सवार होकर आ रही है और हाथी पर सवार होकर जाएंगी।
चैत्रनवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरुपों मां शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, काल रात्रि, महागौरी व सिद्धिदात्री मां की पूजा होती है। वहीं नवरात्रि के पहले दिन घरों से मंदिरों में घट स्थापना का विधान है और मां दुर्गा का आह्वान किया जाता है। जनपद में चैत्र नवरात्रों की इन्हीं तैयारियों के बीच सोमवार को घरों से मंदिरों तक हर ओर माता रानी के स्वागत के साथ नव संवत्सर की तैयारी में श्रद्धालु लगे रहे। ऐसे में जहां बाजारों में मां दुर्गा की पूजा की सामग्री के साथ खाद्य-सामग्री खरीदारों की भीड़ दिखाई दी, वहीं घरों में महिलाओं ने नवरात्रि के पहले दिन माता रानी की पूजा को लेकर साफ-सफाई के साथ तैयारियों को अंतिम रूप देने में जुटी रही। धार्मिक मान्यता के अनुसार चैत्र नवरात्रि पर माता रानी की पूजा के साथ हर घर में कलश स्थापना किए जाने, व्रत रखने की परम्परा दशकों से जारी है। सोमवार को नव संवत्सर के साथ देशभर के साथ नगरीय क्षेत्र में इन्हीं तैयारियों के बीच बाजारों के साथ फुटपाथ पर पूजन सामग्री से लेकर माता के श्रृंगार के लिए वस्त्र, आभूषण, मां की चूनर, धूप, दीप, नारियल, कलावा और ध्वजा समेत फल-फूल खरीदने को लेकर भक्तों में उत्साह है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, चैत्र माह की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को चैत्र नवरात्रि का त्यौहार मनाया जाता है। मंगलवार को घट स्थापना के साथ मां के 9 स्वरूपों की पूजा-अर्चना के बीच अष्टमी और नवमी तिथि के दिन कन्या पूजन के साथ व्रत परायण की परंपरा है। कलश को भगवान श्री विष्णु का रूप माना जाता है, जिसे देवी दुर्गा की पूजा से पहले स्थापना करने का विधान है। घट स्थापना के बाद फिर सभी देवी देवताओं को आमंत्रित किया जाता है। कलश स्थापना के बाद गणेश जी और मां दुर्गा की आरती करते हैं, जिसके बाद नौ दिनों का व्रत शुरू हो जाता है।

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