मुजफ्फरनगर (रिपोर्टर)। हरियाणवी सिनेमा को एक नई सोच, नई शैली और वास्तविक लोकेशनों पर आधारित कहानियों के माध्यम से अलग पहचान दिलाने का प्रयास कर रहे सुखराग मूवीस के बैनर तले बन रही बहुप्रतीक्षित फीचर फिल्म “मुजफ्फरनगर टू कश्मीर” का लगभग 22 दिनों का विशाल शूटिंग शेड्यूल सफलतापूर्वक पूरा हो गया है। यह केवल एक फिल्म की शूटिंग नहीं थी, बल्कि संघर्ष, साहस, अनुशासन, रोमांच, प्रकृति, मानवीय संवेदनाओं और राष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था को बेहद करीब से देखने-समझने वाली एक ऐसी अविस्मरणीय यात्रा रही, जिसने पूरी यूनिट को जीवन भर के लिए यादगार अनुभव दे दिए।
इस फिल्म की शूटिंग उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर से लेकर पंजाब, जम्मू और कश्मीर के अनंतनाग, पहलगाम, पुलवामा, श्रीनगर, सांबा, पूंछ और राजौरी जैसे अनेक ऐतिहासिक एवं प्राकृतिक स्थलों पर की गई। लगभग बाईस दिनों तक चले इस अभियान में कलाकारों, तकनीकी सदस्यों और पूरी यूनिट ने कठिन परिस्थितियों का सामना करते हुए अपने निर्धारित लक्ष्य को सफलतापूर्वक पूरा किया।
फिल्म यूनिट ने 4 जुलाई को चार वाहनों में लगभग 20 कलाकारों, अभिनेता-अभिनेत्रियों, डीओपी, कैमरामैन, मेकअप आर्टिस्ट, कोरियोग्राफर और तकनीकी सदस्यों के साथ कश्मीर के लिए प्रस्थान किया। संयोगवश उसी समय अमरनाथ यात्रा भी चल रही थी। पिछले वर्ष पहलगाम क्षेत्र में हुई आतंकी घटना के बाद पूरे जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा व्यवस्था अत्यंत कड़ी थी। यात्रा मार्ग पर जगह-जगह पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों के नाके लगे हुए थे तथा हर वाहन और यात्री की गहन जांच की जा रही थी।
फिल्म यूनिट के अनुसार कई स्थानों पर यात्रियों और सामान्य पर्यटकों की अलग-अलग जांच की जा रही थी। जिन लोगों के पास आवश्यक यात्रा पंजीकरण नहीं था, उन्हें आगे जाने की अनुमति नहीं मिल रही थी। ऐसे माहौल में फिल्म यूनिट को भी कई बार अपनी पहचान और शूटिंग का उद्देश्य विस्तार से बताना पड़ा।
इसी दौरान चारों वाहन कई बार एक-दूसरे से अलग हो गए। सबसे बड़ी समस्या यह थी कि सामान्य प्रीपेड मोबाइल सिम वहां काम नहीं कर रहे थे। केवल पोस्टपेड अथवा स्थानीय सिम प्रभावी थे। ऊपर से कई क्षेत्रों में नेटवर्क की समस्या इतनी गंभीर थी कि यदि कोई वाहन समूह से अलग हो जाए तो घंटों तक संपर्क स्थापित नहीं हो पाता था। इससे पूरी यूनिट को कई बार चिंता और असमंजस का सामना करना पड़ा।
घंटों जाम, बार-बार रोक, फिर भी नहीं टूटा हौसला
जम्मू से आगे का सफर अपेक्षा से कहीं अधिक कठिन साबित हुआ। कई स्थानों पर लंबा जाम लगा मिला। कहीं घंटों वाहनों की कतारें लगी रहीं तो कहीं निर्धारित समय के बाद प्रवेश पूरी तरह बंद कर दिया जाता था। कुछ स्थानों पर दोपहर एक बजे के बाद तथा कुछ जगह तीन बजे के बाद किसी भी वाहन को आगे नहीं बढ़ने दिया जाता था।
फिल्म यूनिट के सदस्यों का कहना है कि कई बार पुलिस ने उन्हें रोककर लंबी पूछताछ की। परिस्थितियां ऐसी बनीं कि कुछ मौकों पर पूरी यूनिट को रोक लिया गया और आगे बढ़ने की अनुमति मिलने में काफी समय लग गया।
इन्हीं कठिन क्षणों में भारतीय सेना और सीआरपीएफ के अनेक अधिकारियों एवं जवानों ने सहयोग का परिचय दिया। कई बार सुरक्षा बलों के जवान स्वयं पुलिस अधिकारियों से बात कर फिल्म दल को आगे बढ़वाते रहे। कुछ सैन्य अधिकारियों ने व्यक्तिगत स्तर पर भी सहायता करते हुए यह सुनिश्चित किया कि पूरी यूनिट सुरक्षित अपने अगले पड़ाव तक पहुंच सके। लंबे संघर्ष, लगातार जाम और अनेक सुरक्षा जांचों से गुजरने के बाद फिल्म यूनिट देर रात बनिहाल पहुंची और अगले दिन अपने निर्धारित शूटिंग स्थल अनंतनाग पहुंचकर कार्य प्रारंभ कर सकी। अनंतनाग, पहलगाम, पुलवामा, श्रीनगर, सांबा और राजौरी की वादियों में फिल्म के अनेक महत्वपूर्ण दृश्य फिल्माए गए। बर्फ से ढकी चोटियां, हरे-भरे मैदान, झीलें, नदियां और पहाड़ फिल्म की खूबसूरती को एक नया आयाम देते नजर आएंगे।
विशेष रूप से अनंतनाग और पहलगाम के पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले वन गुर्जर परिवारों और स्थानीय लोगों ने फिल्म यूनिट का जिस आत्मीयता से स्वागत किया, उसने पूरी टीम का दिल जीत लिया। कई स्थानों पर लगभग बीस लोगों की पूरी यूनिट के लिए भोजन तैयार कराया गया। चाय-नाश्ता कराया गया और बार-बार आग्रह करने के बावजूद किसी ने कोई पैसा स्वीकार नहीं किया। फिल्म यूनिट के सदस्यों ने कहा कि कश्मीर के लोगों की सादगी, मेहमाननवाजी और सहयोग की भावना ने उनके मन में वहां के समाज के प्रति सम्मान और बढ़ा दिया। टीम के कई सदस्यों ने कहा कि उन्हें ऐसा अपनापन बहुत कम स्थानों पर देखने को मिला है।
सुरक्षा व्यवस्था को बेहद करीब से देखने का अवसर
शूटिंग के दौरान कई ऐसे अवसर आए, जब पूरी यूनिट ने सुरक्षा व्यवस्था की गंभीरता को बहुत करीब से महसूस किया। एक स्थान पर जानकारी मिली कि पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती को हाउस अरेस्ट रखा गया है, जिसके कारण पूरे क्षेत्र में सुरक्षा बलों की तैनाती असाधारण रूप से बढ़ी हुई थी।
शाम 5 बजे के बाद कई मार्गों पर सुरक्षा कारणों से आवाजाही सीमित कर दी जाती थी। ऐसे अवसरों पर कई बार सेना के अधिकारियों ने स्वयं हस्तक्षेप कर फिल्म यूनिट को सुरक्षित होटल तक पहुंचवाया। कुछ मौकों पर सैन्य वाहनों की निगरानी में पूरी यूनिट को उनके ठहरने के स्थान तक पहुंचाया गया। नवरात्रि में केवल कश्मीर की लोकल गाड़ियों को ही चलने की इजाजत थी। सैन्य अधिकारियों का कहना था कि यहां के लोकल लोगों के साथ कितनी भी बड़ी घटना हो जाए उससे फर्क नहीं पड़ेगा, मगर यात्री या टूरिस्ट पर कोई भी आतंकी हमला हो जाए तो जवाबदेही मुश्किल हो जाएगी। वैसे पूरे सफर में सुरक्षा जांच शून्य थी गाड़ी की किसी भी प्रकार की जांच नहीं हो रही थी।
राजौरी के निकट एक प्राकृतिक स्थल पर शूटिंग के दौरान अचानक बड़ी संख्या में सीआरपीएफ के जवान और कई सरकारी वाहन वहां पहुंच गए। कुछ देर के लिए पूरा माहौल तनावपूर्ण हो गया। सुरक्षा अधिकारियों ने कैमरे, रिकॉर्डिंग उपकरण और शूट किया गया फुटेज विस्तार से देखा। फिल्म की कहानी, उद्देश्य तथा पहले बनाई गई फिल्मों की जानकारी लेने के बाद अधिकारियों ने संतुष्टि व्यक्त की। इसके बाद उन्होंने न केवल शूटिंग जारी रखने की अनुमति दी बल्कि आगे के सुरक्षा चेक पोस्टों को भी फिल्म यूनिट के संबंध में पहले से सूचित कर दिया, जिससे आगे का सफर काफी सहज हो गया।
सेना ने दिखाई एक अनोखी प्राकृतिक धरोहर
राजौरी क्षेत्र में तैनात कुछ सैन्य अधिकारियों ने फिल्म यूनिट को एक ऐसे प्राकृतिक सरोवर तक जाने का सुझाव दिया, जिसके बारे में स्थानीय मान्यता है कि वहां स्नान करने से शरीर के अनेक प्रकार के दर्द दूर हो जाते हैं। पूरी यूनिट ने इस स्थान को भी बेहद रोचक और यादगार अनुभव के रूप में देखा।
डल झील के हाउसबोट बने शूटिंग का आकर्षण
कश्मीर प्रवास के दौरान फिल्म यूनिट ने डल झील के प्रसिद्ध हाउसबोट, विभिन्न होटल तथा स्थानीय होमस्टे में ठहरकर शूटिंग की। झील पर तैरते हाउसबोट, सुबह की ठंडी हवाएं, शिकारे और पहाड़ों के बीच का शांत वातावरण फिल्म के कई दृश्यों को जीवंत बनाता नजर आएगा।
इसी दौरान पूरी यूनिट ने कश्मीर की प्रसिद्ध केसर, पश्मीना शॉल, अखरोट और अन्य स्थानीय उत्पादों की भी खरीदारी की।
कश्मीर शेड्यूल पूरा होने के बाद फिल्म की शूटिंग मुजफ्फरनगर में जारी रही। शुक्रतीर्थ, तुगलकपुर, कनाड़ा का सेंचुरी कैमरा गांव, फन कार्निवल और अमेडा सहित कई स्थानों पर फिल्म के महत्वपूर्ण दृश्य फिल्माए गए।
पांच मीटर दूर मगरमच्छ और थम गई सबकी सांसें
पूरे शूटिंग शेड्यूल का सबसे रोमांचक क्षण शुक्रतीर्थ में सामने आया। मुख्य गंगा घाट से लगभग दो सौ मीटर आगे एक प्राकृतिक कुंड में शूटिंग चल रही थी। स्थानीय लोगों ने पहले ही चेतावनी दी थी कि वहां मगरमच्छ रहते हैं।
शुरुआत में पानी के किनारे दो मगरमच्छ बिल्कुल स्थिर पड़े दिखाई दिए। अधिकांश लोगों को लगा कि वे शायद जीवित नहीं हैं। तभी अचानक तीसरा मगरमच्छ तेजी से पानी चीरता हुआ बाहर आया और फिल्म यूनिट से लगभग पांच मीटर की दूरी तक पहुंच गया। यह दृश्य देखकर कई कलाकार भयभीत हो गए। कुछ सदस्यों ने तो अपने जीवन में पहली बार इतने निकट से जीवित मगरमच्छ देखा था। कुछ क्षणों के लिए पूरे शूटिंग स्थल पर सन्नाटा छा गया। सभी लोग सुरक्षित दूरी पर चले गए और स्थिति सामान्य होने के बाद ही शूटिंग दोबारा शुरू की गई। यह अनुभव पूरी टीम के लिए जीवन का सबसे रोमांचक और अविस्मरणीय क्षण बन गया।
फिल्म अभिनेता एवं निर्देशक विकास बालियान ने बताया कि पूरे कश्मीर प्रवास के दौरान अनेक बार ऐसी परिस्थितियां आईं, जब स्थानीय स्तर पर सहयोग की आवश्यकता महसूस हुई। उनके अनुसार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के राष्ट्रीय संयोजक गिरीश जुआल लगातार संपर्क में रहे। देर रात भी उनके फोन उपलब्ध रहे और उन्होंने अपने संगठन तथा स्थानीय जनप्रतिनिधियों के माध्यम से आवश्यक सहयोग उपलब्ध कराने का प्रयास किया, जिससे कई स्थानों पर आगे बढ़ने में सुविधा मिली।
विकास बालियान ने यह भी बताया कि भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत पूरे समय संपर्क में रहे। समय-समय पर उन्होंने पूरी यूनिट की स्थिति की जानकारी ली। उनके अनुरोध पर जम्मू-कश्मीर सरकार में उपमुख्यमंत्री सुरेंद्र सिंह से भी संपर्क स्थापित हुआ। इसके बाद उनके पीआरओ वसीम खान ने फिल्म यूनिट की स्थानीय स्तर पर हर संभव सहायता की। बनिहाल में जब पूरी यूनिट लंबे समय तक फंस गई तो उनके प्रयासों से पीडब्ल्यूडी गेस्ट हाउस की व्यवस्था कराई गई। बाद में जहां भी यूनिट ठहरती, वहां की परिस्थितियों की जानकारी पहले से लेकर आवश्यक मार्गदर्शन भी उपलब्ध कराया जाता रहा।
“मुजफ्फरनगर टू कश्मीर” केवल मनोरंजन प्रधान फिल्म नहीं है। इसमें कश्मीर की प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ कश्मीरी पंडितों के विस्थापन और उनके दर्द का भी संवेदनशील चित्रण किया गया है। कहानी सामाजिक सरोकारों, मानवीय रिश्तों, संघर्ष, प्रेम और भावनात्मक घटनाओं को जोड़ते हुए आगे बढ़ती है। फिल्म में दो मधुर गीत भी शामिल किए गए हैं।
फिल्म में विकास बालियान, वर्षा ठाकुर, पूजा नेगी, विल्सन सिरोही, शिवांक बालियान, आदित्य राठी, अमित पांचाल, रमेश चंद्र आर्य, अतुल वत्सल, चुलबुल पांडे, मधु चौधरी, आर. के. रोशन, रिया चौधरी, विपिन चौधरी जाज़ सहित कई दर्जन कलाकारों ने अभिनय किया है। आराध्या बालियान और लक्ष्य बनवाला ने भी महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई हैं।
फिल्म की निर्माता श्रीमती सुमन बालियान हैं। कहानी, संवाद, स्क्रीनप्ले और निर्देशन विकास बालियान ने किया है। उन्होंने फिल्म में “कबीर” नाम के ऐतिहासिक किरदार को भी निभाया है। अनिकेत सैनी डीओपी, गोविंद सैनी कैमरामैन तथा अंकुर शर्मा मेकअप आर्टिस्ट हैं।
पूरी टीम ने कठिन परिस्थितियों के बावजूद पूरे उत्साह और सकारात्मक सोच के साथ 22 दिनों का यह लंबा शूटिंग अभियान पूरा किया। विकास बालियान के अनुसार यदि यात्रा का समय अमरनाथ यात्रा सीजन से अलग होता तो कई कठिनाइयों से बचा जा सकता था, फिर भी पूरी यूनिट ने हर चुनौती को एक नए अनुभव के रूप में स्वीकार किया।
उन्होंने कहा कि सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि लगभग बीस सदस्यों की पूरी टीम ने किसी भी परिस्थिति में अपना मनोबल नहीं खोया। न किसी के चेहरे पर भय था, न निराशा; बल्कि हर चुनौती को सीख और रोमांच के रूप में स्वीकार करते हुए सभी ने इस पूरे सफर का भरपूर आनंद लिया।
निर्माता का विश्वास है कि यह फिल्म हरियाणवी फिल्म इंडस्ट्री में अपनी अलग पहचान बनाएगी और दर्शकों को मनोरंजन के साथ एक संवेदनशील सामाजिक संदेश भी देगी। यह फिल्म शीघ्र ही सुखराग मूवीस के यूट्यूब चैनल पर रिलीज की जाएगी। चैनल पर फिलहाल आई संस्कार फिल्म को लोग जबरदस्त रूप से सराह रहे हैं। सुखराग मूवीस का चला आ रहा संदेश इस फिल्म के साथ भी पूरी तरह सार्थक दिखाई देता है—”हम सबसे बेहतर नहीं हैं, परंतु हम सबसे अलग हैं।”

श्री राम कॉलेज के फाइन आर्ट्स संकाय में भव्य फ्रेशर्स एवं फेयरवेल समारोह द मेमोरी क्लॉक का आयोजन
मुजफ्फरनगर (रिपोर्टर)। श्री राम कॉलेज मुज़फ्फरनगर के फाइन आर्ट्स संकाय द्वारा आयोजित द मेमोरी क्लॉक फ्रेशर्स एवं फेयरवेल समारोह उत्साह, उल्लास एवं भावनात्मक वातावरण के बीच अत्यंत भव्यता के साथ सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम का उद्देश्य नवप्रवेशित विद्यार्थियों का आत्मीय स्वागत करना तथा अंतिम वर्ष के विद्यार्थियों को सम्मानपूर्वक भावभीनी विदाई देना था। कार्यक्रम का शुभारम्भ






