मुजफ्फरनगर (रिपोर्टर)। पीजेंट वेलफेयर एसोसिएशन के चेयरमैन अशोक बालियान का कहना है कि दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन में वास्तविक नीट अभ्यर्थियों की भागीदारी नगण्य थी। यदि किसी प्रदर्शन में तोड़फोड़, हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान और आपत्तिजनक राजनीतिक नारेबाज़ी हो, तो उसे शांतिपूर्ण छात्र आंदोलन नहीं कहा जा सकता।इसलिए पुलिस कार्रवाई को केवल “छात्रों पर कार्रवाई” के रूप में प्रस्तुत करना वास्तविक स्थिति का पूर्ण चित्र नहीं है।इसलिए हमारा संगठन ‘पीजेंट वेलफेयर एसोसिएशन’ इस कथित आंदोलन का समर्थन नहीं करता है।
हमारे ऑन-ग्राउंड ऑब्जर्वेशन के अनुसार धरने में अधिकतर तमाशबीन, विभिन्न राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता तथा बहुत कम संख्या में ऐसे छात्र थे जिनका NEET से कोई संबंध नहीं था। हमें प्रतीत होता है कि आंदोलन के पीछे एक संगठित लॉजिस्टिक एवं समन्वय तंत्र कार्य कर रहा था, जो पूरे प्रबंधन को संचालित कर रहा था। हमारा मानना है कि किसी भी आंदोलन का समर्थन करने से पहले उसके वास्तविक स्वरूप और उद्देश्यों का निष्पक्ष मूल्यांकन होना चाहिए। लोकतांत्रिक विरोध प्रत्येक नागरिक का अधिकार है, लेकिन उसकी आड़ में अराजकता, हिंसा या देश की छवि को नुकसान पहुँचाने वाले प्रयासों का समर्थन नहीं किया जाना चाहिए।
3 मई 2026 को राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) ने NEET-UG परीक्षा आयोजित की। 8 मई को प्राप्त इनपुट के आधार पर मामला केंद्रीय एजेंसियों को भेजा गया और 12 मई को परीक्षा रद्द कर सीबीआई (CBI) जांच शुरू कराई गई। अब तक 13 आरोपी गिरफ्तार किए जा चुके हैं। सरकार ने 37 दिनों के भीतर पुनः परीक्षा कराई तथा बायोमेट्रिक सत्यापन, AI मॉनिटरिंग, व्यापक CCTV निगरानी और सुरक्षित प्रश्नपत्र परिवहन जैसी अतिरिक्त व्यवस्थाएँ लागू कीं। साथ ही भविष्य में परीक्षा प्रणाली को और सुरक्षित बनाने के लिए Computer-Based Test (CBT) की दिशा में भी कदम बढ़ाए गए।हालाकि सरकार को शुरू में ही वास्तविक छात्रों को बुलाकर वार्ता करनी चाहिए थी। इन कदमों का उद्देश्य छात्रों की चिंताओं का समाधान करना और परीक्षा प्रणाली में विश्वास बहाल करना था। इसके बाद अधिकांश छात्र अपनी पढ़ाई और परीक्षा की तैयारी में लौट गए, जबकि उनके नाम पर विभिन्न समूह आंदोलन करते रहे। शाहीन बाग से लेकर किसान आंदोलन और अब नीट प्रदर्शन तक, सोशल मीडिया पर माहौल बनाने, विशिष्ट हैशटैग चलाने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित करने के लिए एक ही तरह के डिजिटल नेटवर्क और ‘टूलकिट’ का इस्तेमाल देखा गया है। इन आंदोलनों में तुरंत बड़े पैमाने पर टेंट, लाउडस्पीकर, सोशल मीडिया व्लॉगर्स और मुफ्त भोजन (लंगर/कम्युनिटी किचन) की व्यवस्था हो जाती है। यह दिखाता है कि इन आयोजनों के पीछे एक सुव्यवस्थित और अनुभवी लॉजिस्टिक्स सपोर्ट सिस्टम काम करता है।
इस आंदोलन में भी पहले के शाहीन बाग व किसान आंदोलन की तरह सुरक्षा एजेंसियों की छवि बिगाड़ने और पुलिस पर गंभीर आरोप लगाने का एक प्री-प्लान्ड (तयशुदा) नैरेटिव चलाया जा रहा है। हमारा मानना है कि हमें ऐसे आंदोलनों का समर्थन नहीं करना चाहिए, जिनमें चेहरा किसी वर्ग का हो, लेकिन उद्देश्य कुछ और हो। इसलिए प्रत्येक नागरिक का दायित्व है कि वह किसी भी आंदोलन का समर्थन करने से पहले उसके वास्तविक स्वरूप, नेतृत्व और उद्देश्यों का निष्पक्ष मूल्यांकन अवश्य करे।

वाह री मुजफ्फरनगर पुलिस! इंसाफ मांगने वालों पर ही कर दी मुकदमों की बरसात
मुजफ्फरनगर (रिपोर्टर)। थाना तितावी क्षेत्र के ग्राम हैदरनगर जलालपुर में दो मासूम बच्चों की दर्दनाक मौत के बाद इंसाफ की आवाज उठाना ग्रामीणों को भारी पड़ता नजर आ रहा है। पीड़ित परिवार और ग्रामीणों का आरोप है कि स्कूल बस ड्राइवर की कथित लापरवाही से हुई भीषण दुर्घटना में दो मासूमों की जान जाने के






