मुजफ्फरनगर (रिपोर्टर)। डीएवी डिग्री कॉलेज सभागार में महाविद्यालय व प्रज्ञा प्रवाह मेरठ प्रांत की इकाई भारतीय प्रज्ञान परिषद के संयुक्त तत्वावधान में शोध में भारतीय दृष्टिकोण विषय पर विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें शोध कराने वाले शिक्षकों, रिसर्चर स्कॉलर के साथ समाज के प्रबुद्ध वर्ग ने भाग लिया। कार्यक्रम चयनित नागरिकों की सहभागिता एवं भारत केंद्रित विचार कैसे आगे बढ़ाया जाए पर केंद्रित रहा।
प्रज्ञा प्रवाह मेरठ प्रांत इकाई भारतीय प्रज्ञान परिषद एवं डीएवी डिग्री कॉलेज के संयुक्त तत्वावधान में “शोध एवं रिसर्च में भारतीय दृष्टिकोण” विषय पर संपन्न विचार गोष्ठी में शिक्षाविदों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं समाज चयनित प्रबुद्ध व नागरिकों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्राचार्य प्रो योगेश कुमार ने की। मुख्य अतिथि के रूप में समाजसेवी अखिलेश दत्त शर्मा, विशिष्ट अतिथि के रूप में देवराज जी, क्षेत्र संयोजक (पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड) प्रज्ञा प्रवाह एवं प्रोफेसर वंदना वर्मा, सह प्रांत संयोजक, भारतीय प्रज्ञान परिषद, मेरठ प्रांत मंच पर उपस्थित रहे। कार्यक्रम का प्रारंभ मां सरस्वती की प्रतिमा के सामने मेघा द्वारा सरस्वती वंदना के पाठ के साथ दीप प्रज्वलन एवं उनका माल्यार्पण कर किया गया। अतिथि परिचय के पश्चात सबको अंग वस्त्र भेंट कर स्वागत सम्मान किया गया। कार्यक्रम का संचालन एडवोकेट नीरज शर्मा ने किया।
मुख्य वक्ता के रूप में प्रज्ञा प्रवाह के अखिल भारतीय सह संयोजक विनय दीक्षित ने कहा कि, भारतीय शोध परंपरा केवल भौतिक उन्नति तक सीमित नहीं रही, बल्कि सत्य, नैतिकता, लोककल्याण एवं समग्र मानव विकास पर आधारित रही है। उन्होंने कहा कि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा में शोध का उद्देश्य समाज और प्रकृति के बीच संतुलन स्थापित करना था। उन्होंने युवाओं से भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृति और मौलिक चिंतन को अपनाने का आह्वान किया।“शोध में भारतीय दृष्टिकोण” केवल जानकारी जुटाने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि सत्य, अनुभव, लोककल्याण और समग्र ज्ञान की खोज का मार्ग है। भारतीय परंपरा में शोध का उद्देश्य केवल भौतिक उन्नति नहीं, बल्कि व्यक्ति, समाज, प्रकृति और ब्रह्म के बीच संतुलन स्थापित करना भी रहा है।आज विश्व जिन समस्याओं से जूझ रहा है। आज आवश्यकता है कि भारतीय ज्ञान परंपरा का पुनर्मूल्यांकन हो, प्राचीन ग्रंथों का वैज्ञानिक अध्ययन हो, आधुनिक विज्ञान के साथ समन्वय स्थापित किया जाए तथा शोध को केवल डिग्री नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माण और मानव कल्याण का साधन बनाया जाए। फिल्मों ने इतिहासकारों ने पश्चिमी और वामपंथी दृष्टि से भारतीय संघर्ष के असली नायकों को गलत तस्वीर में प्रस्तुत किया भारत की गौरवशाली परंपराओं को गलत अर्थों में प्रस्तुत किया उन्होंने पश्चिमी जगत और वामपंथियों के नॉरेटिव को विस्तार से समझाते हुए कहा कि कैसे उन्होंने भारत विरोध को ही और भारत के चिंतन को ही अपने विशेष मान लिया है और भारत को दिए नहीं मलीन दिखाने में ही पता नहीं क्यों उन्हें आनंद आता है मौलिक सोच, स्वाध्याय भारत केंद्रित विचार, अध्ययन अनुभव और अनुभूति जब तीनों होती हैं तो शोध होता है,भारत की परिवार व्यवस्था भारत की आत्मा है आज भी भारत की ज्ञान परंपरा की कोई कीमत नहीं है भारत में ज्ञान देने पर कोई शुल्क नहीं मिलता ज्ञान की कीमत नहीं ज्ञान कभी राजश्रित नहीं रहा भारत की आत्मा के साथ खिलवाड़ ना हो जाए शोध नहीं है ध्यान रखना ही होगा। विशिष्ट अतिथि देवराज क्षेत्र संयोजक भारतीय प्रज्ञान परिषद ने अपने वक्तव्य में कहा कि हमे देने से अतिरिक्त देना हमारी आदत है उन्होंने कहा कि शोध का अर्थ ही है सत्य की खोज है और हर शोध के केंद्र में भारत होना चाहिए भारत को भारत की दृष्टि से समझना ही चिंतन का और रिसर्च का विषय होना चाहिए।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रोफेसर योगेश कुमार ने कहा कि नई शिक्षा नीति में भारतीय ज्ञान परंपरा और शोध आधारित शिक्षा को विशेष महत्व दिया गया है। उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों को केवल डिग्री प्राप्ति तक सीमित न रहकर समाजोपयोगी एवं राष्ट्र हितकारी अनुसंधान की दिशा में कार्य करना चाहिए। कार्यक्रम में मुख्य रूप से इंजी अवनीश त्यागी प्रांत संयोजक, डॉ रजनीश गौतम, प्रांत प्रचार प्रमुख, डॉ आरके गर्ग, शुभम कुमार, रवि, राजीव गौतम, डॉ पंकज वशिष्ठ, रामप्रसाद शर्मा प्रदेश अध्यक्ष मान्यता प्राप्त विद्यालय महासंघ, पूनम आदि मुख्य रूप से उपस्थित रहे आदि मुख्य रूप से उपस्थित रहे।

भागवत में शुकदेव जी का प्रवेश स्वयं भक्ति, ज्ञान और वैराग्य का अवतरण है-पुण्डीक गोस्वामी महाराज
हरिद्वार (रिपोर्टर)। श्रीगंगा सभा के तत्वावधान में हरकी पैड़ी के मालवीय द्वीप पर आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के तीसरे दिन की कथा श्रवण कराते हुए कथाव्यास मन्माध्व गौडेश्वर वैष्णवाचार्य पुण्डरीक गोस्वामी महाराज ने कहा कि शुकदेव जी का भागवत में प्रवेश केवल एक ऋषि का आगमन नहीं, बल्कि स्वयं भक्ति, ज्ञान और वैराग्य का अवतरण






