विनिमय से मिटता है अहंकार, श्रद्धा से प्रकट होते है राम — मोरारी बापू

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शुकतीर्थ/मुजफ्फरनगर (रिपोर्टर)। शुकतीर्थ में चल रही नौ दिवसीय श्रीराम कथा के आठवें दिन विश्वविख्यात रामकथाकार मोरारी बापू ने कर्मयोग, पतंजलि योगसूत्र, विनियोग तथा अहंकार त्याग का अत्यंत गूढ़ और आध्यात्मिक विवेचन किया। कथा के दौरान बापू ने कहा कि जब जीवन में सही विनियोग होता है तो स्पर्धा समाप्त हो जाती है और श्रद्धा प्रकट होती है। ईर्ष्या, तिरस्कार और अहंकार स्वतः मिट जाते हैं।बापू ने पतंजलि योगसूत्र के प्रथम सूत्र “तप” की व्याख्या करते हुए कहा कि श्रोता और वक्ता दोनों को तपस्वी होना चाहिए। तीन-चार घंटे बैठकर कथामृत का पान करना भी एक तप है। उन्होंने कहा कि शास्त्रों में वचन की अत्यंत महिमा है और कथा भी वचन है, केवल प्रवचन नहीं।उन्होंने दूसरा सूत्र “स्वाध्याय” बताते हुए कहा कि स्वाध्याय से मनुष्य में श्रेष्ठता आती है, जबकि तीसरा सूत्र ईश्वर के नाम और मंत्र का स्मरण है, जो जीवन को दिव्यता प्रदान करता है।
संगीत से जीवन तक ‘विनियोग’ का संदेश
कथा में “विनियोग” शब्द को केंद्र में रखते हुए बापू ने अत्यंत सुंदर उदाहरणों के माध्यम से जीवन का दर्शन समझाया। उन्होंने कहा कि संगीत में ताल, लय, सुर और भाव — इन चार तत्वों का विनियोग होता है। जब गोपियाँ सुर में रोती हैं तो गोविंद भी रो पड़ते हैं।

उन्होंने कहा कि मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार का सम्यक विनियोग हो जाए तो हृदय में परमात्मा प्रकट हो जाते हैं। बापू ने उदाहरण देते हुए कहा कि रसोई के लिए चूल्हा, राशन और मसाले सब हों, लेकिन अग्नि न हो तो भोजन नहीं बन सकता। इसी प्रकार जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सही विनियोग आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि समुद्र के जल पर सूर्य की किरणों का पड़ना भी विनियोग है। जो व्यक्ति जीवन में विनिमय करना सीख जाता है, उसका जीवन सफल हो जाता है। भगवान की कथा में जब विनियोग होता है तो प्रतिस्पर्धा समाप्त होकर श्रद्धा का जन्म होता है। “सारा संसार राममय है” मोरारी बापू ने कहा कि गर्भस्थ, गृहस्थ, विरक्त, संन्यासी और पंडित — सभी हरिकथा के श्रोता हैं। उन्होंने कहा कि जो त्याग करना सीख लेता है, उसे जीवन में दुख नहीं होता। भागवत धर्म जिसके मन में उतर जाता है, उसे पृथ्वी पर सबमें समान रूप से राम दिखाई देते हैं।
उन्होंने कहा— “बस इतनी सी बात समुंदर को खल गई, एक कागज़ की नाव मेरे ऊपर कैसे चल गई।”
बापू ने गुरु वचन का स्मरण कराते हुए कहा—
“निज प्रभुमय देखहि जगत, केहि संग करहिं विरोध।”
अर्थात जब पूरा संसार प्रभुमय है तो विरोध किससे किया जाए।

कथा विस्तार में बापू ने अत्रि और अनुसुइया प्रसंग का अत्यंत भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने कहा कि जो तीनों गुणों से परे हो वही अत्रि है। भगवान राम के आश्रम आगमन पर माता जानकी ने अनुसुइया के चरणों में प्रणाम किया। अनुसुइया ने सीता जी को दिव्य वस्त्र प्रदान कर नारी धर्म की विस्तृत महिमा बताई। बापू ने कहा कि मातृशक्ति यदि अपने कर्तव्य का पालन करे तो उसे अलग से किसी साधना की आवश्यकता नहीं रहती। सुतीक्ष्ण, कुम्भज ऋषि और पंचवटी प्रसंग बापू ने विराध, सुतीक्ष्ण और कुम्भज ऋषि प्रसंग का भी विस्तारपूर्वक वर्णन किया। उन्होंने कहा कि अत्यंत तीक्ष्ण बुद्धि वाला ही सुतीक्ष्ण कहलाता है। सुतीक्ष्ण भगवान के ध्यान में लीन थे और प्रभु ने उन्हें अपना चतुर्भुज स्वरूप दिखाया।
इसके बाद राम, लक्ष्मण और जानकी सुतीक्ष्ण के साथ कुम्भज ऋषि के आश्रम पहुंचे। जब सुतीक्ष्ण ने कहा कि “नाथ आए हैं” तब गुरु नहीं उठे, लेकिन जब उन्होंने कहा कि “जगत आधार राम, लक्ष्मण और जानकी आए हैं” तो कुम्भज ऋषि भावविभोर होकर दौड़ पड़े।
कुम्भज ऋषि ने भगवान राम को मंत्र देकर पंचवटी जाकर दंडकारण्य के उद्धार का निर्देश दिया।पंचवटी में भगवान राम ने लक्ष्मण को माया, ज्ञान, वैराग्य तथा जीव-ईश्वर का गूढ़ रहस्य समझाया। बापू ने कहा कि भगवान राम ने माया की जितनी सटीक व्याख्या की है, वैसी कहीं नहीं मिलती।उन्होंने कहा— “मैं, मोर, तुम और तोर — यही माया है।”राम ने ज्ञान की परिभाषा देते हुए कहा कि जहाँ अभिमान नहीं है, वही सच्चा ज्ञान है। जो सबमें समान रूप से ब्रह्म को देखे वही ज्ञानी है।वैराग्य की व्याख्या करते हुए प्रभु ने कहा कि जो तीनों गुणों और समस्त सिद्धियों को तिनके समान त्याग दे, वही सच्चा वैरागी है।कथा के अंतिम चरण में बापू ने शूर्पणखा प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने कहा कि कोई उसे तृष्णा कहता है, कोई वासना और कोई अविद्या। राम और लक्ष्मण के सौंदर्य को देखकर शूर्पणखा मोहित हो गई और विवाह का प्रस्ताव रखा।भगवान राम ने मर्यादा का परिचय देते हुए स्वयं को विवाहित बताया तथा लक्ष्मण की ओर संकेत किया। लक्ष्मण ने स्वयं को प्रभु का दास बताते हुए शूर्पणखा को पुनः राम के पास भेज दिया। अंततः क्रोधित होकर जब वह सीता जी की ओर बढ़ी तो प्रभु के संकेत पर लक्ष्मण ने उसके नाक-कान काट दिए।बापू ने कहा कि लक्ष्मण ने शूर्पणखा को विरक्ति प्रदान की।इसके बाद उन्होंने रामसेतु और रामेश्वरम स्थापना तक की कथा का सुंदर विस्तार किया। कथा के दौरान श्रद्धालु भावविभोर होकर कथा श्रवण करते दिखाई दिए।

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