मुजफ्फरनगर। मुजफ्फरनगर में प्रदूषण की स्थिति गंभीर हो गई है। दिल्ली से 120 किलोमीटर दूर स्थित यह एनसीआर का हिस्सा अब विश्व के सबसे प्रदूषित शहरों में शामिल हो गया है। जानसठ रोड और जौली रोड पर स्थित फैक्टरियां दिन-रात काला धुआं छोड़ रही हैं। इन फैक्टरियों में पेपर मिल्स, केमिकल प्लांट और वेस्ट टायर रिसाइक्लिंग यूनिट्स शामिल हैं। शाम होते ही इन सड़कों पर धुएं का प्रकोप बढ़ जाता है।
आरटीआई कार्यकर्ता सुमित मलिक की शिकायत पर डीएम ने जांच के आदेश दिए। जांच में 17 फैक्टरियों पर 52 लाख रुपये से अधिक का जुर्माना लगाया गया। लेकिन उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की कार्रवाई अभी तक प्रभावी नहीं हुई है। स्थानीय लोगों के अनुसार, धुएं के कारण सड़कों पर विजिबिलिटी शून्य हो जाती है। राहगीरों को सांस लेने में तकलीफ होती है। आंखों में जलन की शिकायत आम है। वाहन चालकों को हादसों का खतरा बना रहता है। वर्तमान में मानसून के कारण एयर क्वालिटी इंडेक्स ग्रीन जोन में है। हालांकि, सर्दियों में यह रेड जोन में पहुंच जाने की आशंका है। यह स्थिति हर साल दोहराई जाती है।
मुजफ्फरनगर में दिल्ली-देहरादून का कचरा हैरान करने वाली सच्चाई यह है कि मुजफ्फरनगर उत्तर भारत का सबसे बड़ा कूड़ा डंपिंग यार्ड बन चुका है। दिल्ली देहरादून और चंडीगढ़ से हजारों टन रिफ्यूज्ड ड्राइव फ्यूल कूड़ा रोजाना यहां की फैक्ट्रियों में जलाया जा रहा है। ट्रक चालक फरमान ने खुलासा किया, “एक डंपर में 45-48 टन RDF आता है। हम रोजाना भोपा रोड जौली रोड, और जानसठ रोड की पेपर मिल्स में इसे पहुंचाते हैं।” कहने को यह रिसाइक्लिंग के लिए है, लेकिन हकीकत में दिल्ली के गाजीपुर जैसे कूड़े के पहाड़ों से दलालों के जरिए सीधे जलाया जा रहा है। यह जहरीला धुआं हवा में घुलकर लोगों की सांसों को जहर बना रहा है। क्या यह पर्यावरणीय अपराध नहीं है? ग्रामीणों पर कहर, कैंसर और सांस की बीमारियां जानसठ और जौली रोड के आसपास के जैसे निराना और भिक्की – में ग्रामीणों की जिंदगी जहन्नुम बन चुकी है। दूषित जल और हवा की वजह से कैंसर फेफड़ों की बीमारियां और आंखों में जलन आम हो गए हैं। निराना गांव में कैंसर से कई मौतें हो चुकी हैं, और दर्जनों लोग संक्रमित हैं। ग्रामीण निर्देश ने बताया, “रोजाना बाइक से काम पर जाते हैं, लेकिन धुएं से आंखें जलती हैं। सांस लेना मुश्किल हो जाता है।” यह प्रदूषण न केवल सेहत को नुकसान पहुंचा रहा है, बल्कि ग्रामीणों की आजीविका पर भी असर डाल रहा है। बारिश की मेहरबानी से अभी राहत है, लेकिन सर्दियों में यह धुआं कोहरे के साथ मिलकर मौत का कॉकटेल बन जाएगा।
RTI कार्यकर्ता की पुकार, 52 लाख का जुर्माना, फिर भी नाकाफी
20 अगस्त को किसान दिवस के मौके पर RTI कार्यकर्ता सुमित मलिक ने जिलाधिकारी उमेश मिश्रा के सामने प्रदूषण की समस्या को जोरदार तरीके से उठाया। सुमित ने फैक्ट्रियों द्वारा वायु-जल प्रदूषण और प्रतिबंधित प्लास्टिक कचरा जलाने की शिकायत दर्ज की। इसके बाद डीएम ने SDM और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (UPPCB) की संयुक्त जांच टीम गठित की। क्षेत्रीय प्रदूषण अधिकारी गीतेश चंद्रा ने बताया कि 17 फैक्ट्रियों की जांच में दो को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया, और कुछ में गंभीर अनियमितताओं के लिए 52 लाख 2 हजार 500 रुपये का जुर्माना लगाया गया। लेकिन यह कार्रवाई नाकाफी है। सवाल उठता है-क्या इतने बड़े पैमाने पर फैल रहे प्रदूषण को रोकने के लिए यह जुर्माना और नोटिस काफी हैं? ग्रामीणों का कहना है कि ये कदम महज खानापूर्ति हैं। मुजफ्फरनगर में प्रदूषण की स्थिति गंभीर है।
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की लापरवाही चरम पर है। वायरल वीडियो, ग्रामीणों की शिकायतें और मीडिया रिपोर्ट्स के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं। गीतेश चंद्रा जैसे अधिकारी कॉल और व्हाट्सएप मैसेज का जवाब देने से कतराते हैं। नोटिस भेजकर कागजी कार्रवाई पूरी कर ली जाती है, लेकिन फैक्ट्रियां बेरोकटोक चल रही हैं। पिछले कुछ हफ्तों में दर्जनों वीडियो वायरल होने के बाद भी कोई फैक्ट्री सील नहीं हुई। क्या बोर्ड उद्योगपतियों के दबाव में है या भ्रष्टाचार का खेल चल रहा है? सुमित मलिक ने कहा, “हर कोई इस जहर को देख रहा है, सिवाय प्रदूषण बोर्ड के। यह शर्मनाक है कि जनता की जान की कीमत पर फैक्ट्रियां चल रही हैं।
52 लाख का जुर्माना और दो नोटिस इस जहरीले तूफान को रोकने के लिए नाकाफी हैं। बारिश की मेहरबानी से अभी AQI ग्रीन है, लेकिन सर्दियों में यह रेड जोन में होगा, और तब कैंसर, अस्थमा (Asthma), और फेफड़ों की बीमारियां और बढ़ेंगी। मुजफ्फरनगर को बचाने के लिए कठोर कदम जरूरी हैं। क्या प्रशासन जागेगा, या यह शहर प्रदूषण की काली चादर में दम तोड़ देगा? यह सवाल हर मुजफ्फरनगरी के मन में है। RTI कार्यकर्ता सुमित मलिक जैसे लोग उम्मीद की किरण हैं, लेकिन बिना सिस्टम के सहयोग के यह जंग अधूरी है।






