मीरांपुर चुनाव में लटका महंगी दीपावली नुमाइश का खेल

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मुजफ्फरनगर। त्यौहारी सीजन में मीरापुर विधानसभा सीट पर हो रहे उपचुनाव के कारण जनपद का विकास और मनोरंजन की तैयारी सभी धरी रह गई। जिला प्रशासन ने दीपावली के अवसर पर इस बार भी लोगों को चिरपरिचित नुमाइश के सहारे सर्द रातों में मनोरंजन की गरमाहट देने की तैयारी की थी और 25 दिन की इस नुमाइश को दीपावली मेले के नाम पर आयोजित कराने के लिए जिला प्रदर्शनी समिति ने ठेका छोड़ने की तैयारी भी कर ली थी, लेकिन टैण्डर से पहले ही निर्वाचन आयोग द्वारा मीरापुर सीट पर उपचुनाव का ऐलान कर दिया गया।
अब चुनाव निपटने के बाद नवम्बर के अंतिम सप्ताह से यह नुमाइश आयोजित कराने का विचार बन रहा है। इस बार भी 25 दिन की यह नुमाइश महंगाई का ऐसा तड़का लगाने जा रही है, जो पिछले तमाम रिकॉर्ड को तोड़ने वाला साबित होगा। इस बार की नुमाइश का ठेका तीन करोड़ रुपये से पार होने की संभावना है। ऐसे में इस महंगी नुमाइश के आयोजन में मनोरंजन कर पाना सर्दी में भी गर्मी का अहसास कराने वाला साबित होगा और बच्चों की जिद के आगे मम्मी पापा की भी खूब रेल बनने वाली है।
जनपद की नुमाइश का अपना एक बड़ा और पारम्परिक सांस्कृतिक मनोरंजन का इतिहास रहा है। इसे पहले गर्मियों के सीजन में जिला कृषि एवं औद्योगिक प्रदर्शनी के नाम से आयोजित कराया जाता था ताकि जनपद के लोगों को एक वृहद बाजार और मनोरंजन के साधन के साथ ही किसानों को फसल उत्पादन की तकनीकी जानकारी और उन्नत फसल बीजों की जानकारी प्रदान कर जनपद की खेती को उत्कृष्ट बनाने का काम किया जा सके। समय बीता और 2013 के दंगों के बाद नुमाइश का यह आयोजन बंद करा दिया गया। इसके बाद इस नुमाहश को शुरू तो किया गया, लेकिन इसका पूरा स्वरूप ही बदल दिया गया। गर्मी की नुमाइश सर्द रातों में मनोरंजन का तड़का लेकर आई। पिछले कई साल से नुमाइश का आयोजन दीपावली पर्व के आसपास ही कराया जा रहा है। जो नुमाइश कृषि प्रदर्शनी के रूप में पहचान रखती थी, उसे दीपावली मेले के रूप में नया नाम, रंग और रूप दिया गया। इसके साथ ही यह नुमाइश महंगाई का भी एक पर्यायवाची बन गई। साल 2023 में करीब एक माह का दीपावली मेला आयोजित हुआ तो इसका ठेका जिला प्रदर्शनी समिति के द्वारा 2.38 करोड़ रुपये में छोड़ा गया था। इस पर 18 प्रतिशत जीएसटी भी वसूल किया गया। नुमाइश में भीड़ जुटाने के लिए प्रदर्शनी समिति के द्वारा बने आयोजन भी कराये गये और कई मशहूर स्टार को यहां पर नाइट शो के लिए बुलाया गया, लेकिन इस नुमाइश को दो मैदानों पर बांटने के कारण भीड़ इससे विमुख ही रही और महंगा मेला आकर्षण पैदा नहीं कर पाया। मेला निपटा तो ठेकेदार ने निर्धारित पैसा जमा कराने से इंकार कर दिया और पहली बार नुमाइश मैदान के गेट पर ताले जड़ दिये गये। आखिरकार प्रदर्शनी समिति ने ठेके का पूरा पैसा वसूल किया।
अब इस साल भी प्रशासन ने नुमाइश का आयोजन कराने के लिए तैयारी की थी। 25 दिन के दीपावली मेले की शुरूआत 25 अक्टूबर से कराने की पूरी तैयारी कर ली गई थी। इसके लिए प्रदर्शनी समिति की ओर से टैण्डर आमंत्रित किये गये थे, जिसकी जमानत राशि ही तीन लाख रुपये रखी गयी और टैण्डर मूल्य 15 हजार रुपये तय किया गया, लेकिन इसी बीच मीरापुर उपचुनाव की घोषण हो जाने से जिले में आचार संहिता लागू हो गई। इसके कारण टैण्डर स्थगित कर दिया गया। सूत्रों के अनुसार अब यह नुमाइश 25 नवम्बर के बाद आयोजित कराये जाने की तैयारी प्रशासन कर रहा है। इस बार ठेके की बोली 2.50 करोड़ रुपये से शुरू होने की संभावना है और ऐसे में यह टैण्डर तीन करोड़ तक पहुंचेगा, इतना ही नहीं टैण्डर राशि पर 18 प्रतिशत जीएसटी भी लगेगी तो यह ठेका तीन करोड़ रुपये से भी पार होने की संभावना बनी है। 25 दिन की नुमाइश के लिए यदि ठेकेदार तीन करोड़ रुपये चुकायेगा तो इतनी महंगी नुमाइश लोगों पर आर्थिक रूप से एक बोझ ही बनती नजर आयेगी। नुमाइश के आयोजन में बच्चों की जिद के आगे उनके अभिभावकों और माता पिता की तो पूरी रेल ही बनती नजर आयेगी, क्योंकि इस नुमाइश का लोगों के बीच बड़ा उत्साह और आकर्षण बना रहता है। वहीं लोगों का कहना है कि पहले यह नुमाइश लोगों के लिए एक मनोरंजन का साधन और ब्याह-शादी के लिए खरीदारी का अवसर लेकर आती थी। महंगाई से हमेशा अछूती रहती थी, लेकिन पिछले कुछ सालों में तो नुमाइश ने महंगाई के सारे रिकॉर्ड ही ध्वस्त कर दिये। अब यदि इस नुमाइश के आयोजन की बात करें तो इस बार 25 दिन के मेले के लिए ठेका तीन करोड़ तक पहुंचने की संभावना है, ऐसे में एक दिन के लिए ठेकेदार को 12 लाख रुपये प्रदर्शनी समिति में जमा कराने होंगे। ऐसे में वो कितना वसूल करेगा, यह सोचनीय विषय है। ये पैसा जायेगा आम आदमी की जेब से ही, क्योंकि नुमाइश से जनपद का धनाढ्य वर्ग तो हमेशा ही दूर रहा है और इसको मध्यम वर्ग के लोगों का मेला ही माना जाता रहा है। वहीं प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि नुमाइश को महंगा ठेकेदारों की प्रतिस्पर्धा ने किया है। हर साल इसका ठेका लेने के लिए प्रदेश स्तर के ठेकेदार टैण्डर में सम्मिलित होते रहे हैं, ऐसे में ठेका लेने के लिए जो प्रतिस्पर्धा होती रही है, उसमें वर्चस्व बनाने के लिए ठेकेदारों ने ही बड़ी बोलियां लगाकर टैण्डर को इतने बड़े दाम तक पहुंचाने का काम किया है। ऐसे में हर साल ठेका महंगा और महंगा होता जा रहा है।

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