दर्द से दिव्यता तक रेस्क्यू फाउंडेशन की सैकड़ों बच्चियों ने परमार्थ निकेतन में पाया जीवन का नया सूर्याेदय

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ऋषिकेश (संतोष कुमार)। परमार्थ निकेतन में रेस्क्यू फाउंडेशन मुंबई और दिल्ली की सैकड़ों बच्चियाँ त्रिवेणी आचार्या और उनकी टीम के नेतृत्व में परमार्थ निकेतन आयी। परमार्थ निकेतन के दिव्य, शांत व आध्यात्मिक वातावरण में इन बच्चियों ने पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी के पावन सान्निध्य में प्रार्थना, गंगा स्नान, हवन, ध्यान, गंगा आरती और सत्संग के माध्यम से जीवन में होप और हैप्पीनेस संदेश प्राप्त किया। जब जीवन के पन्नों पर पीड़ा, अन्याय और अंधकार की स्याही गहरी हो जाए, तब कहीं न कहीं ईश्वर आशा की एक किरण भी भेजता है। यही किरण उन बच्चियों को परमार्थ निकेतन में प्राप्त हुयी। जिन नन्हीं आँखों ने जीवन में असहनीय दर्द देखा, जिन मासूम चेहरों ने समय से पहले संघर्षों की कठोरता झेली, उन्हीं चेहरों पर मुस्कान लाने के लिये प्रतिवर्ष परमार्थ निकेतन उन्हें आमंत्रित करता है ताकि उन्हें अपनत्व का अनुभव हो सके।

पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने बच्चियों को संबोधित करते हुए कहा कि, “तुम पीड़ा की कहानी नहीं, शक्ति की पहचान हो। तुम्हारे जीवन में जो हुआ, वह तुम्हारी नियति नहीं है। तुम्हारा भविष्य तुम्हारे साहस, आत्मविश्वास और ईश्वर पर विश्वास से निर्मित होगा। कभी स्वयं को कमजोर मत समझना क्योंकि तुम सब जीवन की विजेता हो।”
उनके ये शब्द सुनकर अनेक बच्चियों की आँखें नम हो गईं। बच्चियां ऐसे अनुभव कर रही थी जैसे वे वर्षों से भीतर कैद पीड़ा के मुक्त हो रही हो। वे ऐसा एहसास कर रही थी मानों जैसे किसी ने उनके हृदय पर रखे भारी पत्थर को हटाकर फिर से जीने की राह दिखा दी हो। इस एक सप्ताह की यात्रा में उनके आध्यात्मिक व नैतिक विकास के साथ उनका आत्मविश्वास जगाने हेतु अनेक विशेषज्ञों द्वारा उन्हें प्रशिक्षित किया गया।

रेस्क्यू फाउंडेशन द्वारा प्रतिवर्ष इन बच्चियों को एक सप्ताह के लिये परमार्थ निकेतन लाया जाता है, ताकि उन्होंने अपने जीवन में जो दर्द, भय, अपमान और असुरक्षा का अनुभव किया है, उससे वे बाहर निकल सकें। यहाँ पर विभिन्न सत्रों व गतिविधियों के माध्यम से उनकी आत्मा का उपचार किया जाता है। यहाँ उन्हें अपनापन मिलता है और संबल प्रदान किया जाता है है। एक बच्ची ने भावुक होकर कहा, “हमने पहली बार महसूस किया कि हम भी सम्मान, प्रेम और खुशी के अधिकारी हैं।” “यहाँ आकर लगा कि भगवान हमें भूले नहीं हैं।” पूज्य स्वामी जी ने कहा कि, “यदि समाज हर पीड़ित बच्चे का हाथ थाम ले, तो कोई भी बच्चा अपने घावों और अपने दर्द के साथ अकेला नहीं रहेगा। प्रत्येक बच्चा व बच्ची सम्मान, शिक्षा, सुरक्षा और मुस्कान के अधिकारी है।”
परमार्थ निकेतन का यह एक सप्ताह इन बच्चियों के लिये उनके जीवन की दिशा बदलने वाला अध्याय है। आज जब इन बच्चियों ने विदा ली तो वह क्षण भावुक करने वाला था, लग रहा था मानों वो अपने मायके से जा रही हों। यह क्षण मानवता की जीत, करुणा का उत्सव और आशा का महापर्व था।
पूज्य स्वामी जी के पावन सान्निध्य में इन बच्चियों को आत्मिक और आध्यात्मिक स्पर्श प्रदान किया गया। गंगा नन्दिनी के निदेशन में उमा, कियारा, अनिशा, नन्दबाला, स्वामी भक्तानन्द जी और अन्य विशेषज्ञों व विद्वानों ने विभिन्न सत्रों के माध्यम से उन्हें दर्द से उबरने व साहस के साथ आगे बढ़ने का संदेश दिया।
गंगा नन्दिनी ने उन्हें पोषण, स्वास्थ्य व संतुलित आहार के विषय में भी जानकारी प्रदान की। समग्र और संतुलित भोजन परंपराओं के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारत सरकार का “मेरी थाली सेहतवाली” अभियान स्थानीय और मौसमी खाद्य पदार्थों पर आधारित पौष्टिक एवं संतुलित आहार को प्रोत्साहित करता है। उसे हमें अपने जीवन का अंग बनाना होगा। बच्चियों को पर्यावरण संरक्षण का संदेश देते हुये उन्हें नन्हें गमले व पौधों के बीज देकर यात्रा की याद में पौधों का रोपण करने का संदेश दिया।

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